लखनऊ कोचिंग अग्निकांड: नियति या लापरवाही से हुई हत्या?
सोमवार की दोपहर थी, लखनऊ के अलीगंज में ऊषा मेहता मार्ग पर एक तीन मंजिला इमारत में ऐसी आग लगी कि 15 बच्चे उसमें जलकर राख हो गए।
उस वक्त कोई नहीं जानता था कि यह दोपहर उन 15 बच्चों के लिए आखिरी दोपहर होगी।
अब क्योंकि गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं तो 30 से 35 बच्चे उस कोचिंग सेंटर पर ऑनलाइन एनिमेशन, गेम डेवलपमेंट, 3D मॉडलिंग सीखने के लिए आए हुए थे।
और जैसे ही कोचिंग से धुआं निकलने लगा, बच्चे गेट से निकलने के लिए भागे तो पता लगा कि ऑटोमेटिक एग्जिट गेट, जो सिर्फ थंब इम्प्रैशन से खुलता था, वो लॉक हो गया।
फिर कुछ बच्चे छत की ओर भागे लेकिन वहां पर पहुंचकर पता लगा कि छत पर ताला लगा हुआ है।
कुछ बच्चों ने बाथरूम में छुपकर अपनी जान बचाने की कोशिश की लेकिन जहरीले धुएं से नहीं बच सके और वो वहीं पर ही अचेत हो गए।
फिर कुछ बच्चों ने टूटी खिड़की से कूदकर अपनी जान बचाई। यानी कि 15 बच्चे जलकर राख हो गए, 15 बच्चों ने कूदकर अपनी जान बचाई और कुछ बच्चों का इलाज अभी चल रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली अग्निकांड से कोई सबक नहीं लिया?
सवाल यह है कि मृतक के परिवार को ₹5 लाख दिए जाएंगे, क्या वो ₹5 लाख काफी हैं? एक साल भी नहीं कटता है ₹5 लाख में।
और नहीं चाहिए कोई ₹5 लाख, बस जवाब चाहिए और एक्शन चाहिए—बिल्डिंग के मालिक पर, LDA के अधिकारियों पर, नगर निगम के अधिकारियों पर और दमकल विभाग के अफसर पर।
सवाल यह है कि क्या इन सबको जेल भेजा जाएगा? सवाल यह है कि क्या इन सबके घर पर बुल्डोजर चलाया जाएगा?
कोचिंग सेंटर जो कब्रगाह बन गया, 15 बच्चे जो राख हो गए, ये नियति नहीं बल्कि हत्या है जिसके जिम्मेदार ये सब के सब लोग हैं।